कुटेला खदान में फ्लाईऐश डस्ट भराव का मामला—क्या नियमों की अनदेखी कर दिया गया काम?

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सारंगढ़ बिलाईगढ़,,, नगर पालिका क्षेत्र के वार्ड नंबर-1 कुटेला में स्थित एक पुरानी पत्थर की खदान को फ्लाईऐश डस्ट डालकर पाटने का कार्य लगभग पूरा हो चुका है। लेकिन इस पूरे प्रकरण को लेकर कई अहम सवाल खड़े हो रहे हैं—क्या यह काम कानून के मुताबिक हुआ या फिर नियमों को ताक पर रखकर चुपचाप निपटा दिया गया?

जानकारी के अनुसार, किसी भी खदान में फ्लाईऐश डालने के लिए तीन स्तर की अनुमति जरूरी होती है—

1. पर्यावरण विभाग की अनुमति
पर्यावरण संरक्षण अधिनियम 1986 और फ्लाईऐश अधिसूचना 1999 (संशोधित 2003, 2009, 2016) के तहत खदान की पर्यावरणीय जांच, पानी व मिट्टी की रिपोर्ट अनिवार्य होती है।

2. एसडीएम की मंजूरी
ताकि यह सुनिश्चित किया जा सके कि आसपास की आबादी, जल स्रोत और भूजल स्तर पर कोई खतरा न हो।

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3. कलेक्टर की अंतिम स्वीकृति
यदि खदान सरकारी है, तो टेंडर, नोटिस और पब्लिक नोटिफिकेशन जारी करना जरूरी है।

 

अब सवाल यह है—क्या कुटेला खदान में इन सभी प्रक्रियाओं का पालन किया गया? अगर हां, तो संबंधित दस्तावेज कहां हैं? अगर नहीं, तो फिर यह काम शुरू कैसे हुआ?

स्थानीय सूत्र बताते हैं कि यह खदान आबादी वाले इलाके में स्थित है। पहले इसमें पानी भरा रहता था, जिसका अर्थ है कि इसके नीचे जल स्रोत मौजूद हैं। फ्लाईऐश डस्ट में आर्सेनिक, पारा और सीसा जैसे खतरनाक रसायन पाए जाते हैं, जो जमीन के भीतर रिसकर भूजल को प्रदूषित कर सकते हैं। यह पानी नलों और बोरवेल के माध्यम से घर-घर पहुंचता है, जिससे आम लोगों की सेहत पर गंभीर असर पड़ सकता है।

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नियमों के अनुसार, फ्लाईऐश डालते समय हर परत के बाद मिट्टी डालना अनिवार्य है, ताकि प्रदूषण का खतरा कम हो। लेकिन सूत्रों का कहना है कि कुटेला खदान में मिट्टी की परत डालने के बजाय सीधे फ्लाईऐश भर दिया गया।

सबसे बड़ा सवाल यही है—अगर अनुमति दी गई थी, तो किस आधार पर? अगर अनुमति नहीं थी, तो प्रशासन ने अब तक इस मामले पर चुप्पी क्यों साध रखी है? क्या पर्यावरण विभाग और एसडीएम ने मौके पर निरीक्षण किया? यदि किया, तो रिपोर्ट क्या कहती है?

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अगर खदान सरकारी है तो टेंडर, नोटिस और विज्ञापन की प्रक्रिया पूरी हुई या नहीं? अगर खदान निजी है, तो मालिक कौन है और उसे इस तरह का काम करने की अनुमति किसने दी?

यह मामला सिर्फ एक खदान का नहीं, बल्कि पर्यावरण, कानून और लोगों की सेहत से जुड़ा गंभीर मुद्दा है। सवाल यह भी है कि क्या इस पर जांच होगी, क्या जिम्मेदार जवाब देंगे और क्या नियम तोड़ने वालों पर कोई कार्रवाई होगी?

इस पूरे प्रकरण को लेकर स्थानीय लोगों में चिंता और आक्रोश दोनों देखने को मिल रहा है। अब देखना यह होगा कि प्रशासन इस मामले में क्या कदम उठाता है।


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