जंगल की पगडंडियों पर अब सुरक्षित कदम, चरण पादुका से मिला श्रम को सम्मान मोदी की गारंटी’ से पांच साल बाद फिर शुरू हुई लोककल्याणकारी योजना, प्रदेश के 12 लाख 40 हजार से अधिक तेंदूपत्ता संग्राहकों को मिलेगा लाभ

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विशेष लेख//

गुलाब डड़सेना
सहायक संचालक

 

सारंगढ़–बिलाईगढ़ में 18 हजार 225 संग्राहकों तक पहुंची चरण पादुका, छूटे हितग्राहियों के घर-घर पहुंचा विभागीय अमला

छत्तीसगढ़ के जंगल केवल हरियाली और प्राकृतिक संपदा के प्रतीक नहीं हैं, बल्कि वनांचल में बसे लाखों परिवारों की आजीविका का आधार भी हैं। इन्हीं जंगलों में सुबह की पहली किरण के साथ हाथों में तेंदूपत्ता संग्रहण की टोकरी लिए निकलने वाले संग्राहकों के सामने कंटीली झाड़ियां, नुकीले पत्थर और ऊबड़-खाबड़ पगडंडियां होती हैं। कई घंटे जंगल में चलकर किया जाने वाला तेंदूपत्ता संग्रहण उनके परिवार की आमदनी का महत्वपूर्ण जरिया है। बच्चों की पढ़ाई से लेकर घर की रोजमर्रा की जरूरतों तक इस मेहनत से जुड़ी हैं। ऐसे में इन कठिन वन-पथों पर संग्राहकों के पैरों तक पहुंच रही चरण पादुका उनके लिए केवल एक सुविधा नहीं, बल्कि सुरक्षा का सहारा और उनके श्रम के सम्मान का अहसास बन रही है।
करीब पांच साल से बंद इस लोककल्याणकारी योजना को ‘मोदी की गारंटी’ के तहत मुख्यमंत्री श्री विष्णुदेव साय ने पुनः प्रारंभ किया है। मुख्यमंत्री श्री साय ने कोंडागांव में आयोजित ‘जंगल जतरा 2024’ महासम्मेलन में चरण पादुका योजना को फिर शुरू करने की घोषणा की थी। इसके बाद दुर्ग जिले के जामगांव में महिला तेंदूपत्ता संग्राहकों को चरण पादुका पहनाकर योजना का विधिवत शुभारंभ किया गया। योजना के पुनः संचालन से प्रदेश के 12 लाख 40 हजार से अधिक तेंदूपत्ता संग्राहकों को इसका लाभ दिया जाना है।
प्रदेश के नवीनतम जिलों में एक सारंगढ़–बिलाईगढ़ जिले में चरण पादुका योजना का बेहतर क्रियान्वयन किया जा रहा है। सेवा संकल्प अभियान के दौरान इस योजना के अभ्यर्थियों के सुखद किस्से कहानियां भी सामने आ रही है।

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सारंगढ़–बिलाईगढ़ जिले में 18 हजार 225 तेंदूपत्ता संग्राहकों तक पहुंची चरण पादुका इसी जमीनी बदलाव की कहानी कहती है। जंगल वही हैं, तेंदूपत्ता संग्रहण की मेहनत भी वही है और पगडंडियां भी वही हैं, लेकिन अब इन पगडंडियों पर बढ़ते हजारों कदमों के साथ सुरक्षा, सुविधा और सम्मान का नया भरोसा भी जुड़ गया है।
तेंदूपत्ता संग्रहण छत्तीसगढ़ के वनांचल में रहने वाले हजारों परिवारों की जिंदगी और स्थानीय अर्थव्यवस्था से गहराई से जुड़ा है। संग्रहण का मौसम आते ही परिवार जंगलों का रुख करते हैं। पत्तों की तलाश में उन्हें घंटों कंटीली झाड़ियों, नुकीले पत्थरों और दुर्गम रास्तों से गुजरना पड़ता है। इस दौरान पैरों में चोट लगने का खतरा बना रहता है। ऐसे में चरण पादुका जंगल की कठिन राह पर संग्राहकों के कदमों को सुरक्षा देने के साथ उनके रोजमर्रा के काम को अधिक सहज बनाने में मददगार साबित हो रही है।

सारंगढ़–बिलाईगढ़ में 18 हजार 225 संग्राहकों तक पहुंची योजना

चरण पादुका योजना के पुनः प्रारंभ होने के बाद इसकी सुखद तस्वीर सारंगढ़–बिलाईगढ़ जिले के वनांचल में भी दिखाई दे रही है। जिले में अब तक 18 हजार 225 तेंदूपत्ता संग्राहकों को चरण पादुका का लाभ मिल चुका है। वन विभाग द्वारा जिला स्तर पर समितिवार आयोजन कर पात्र संग्राहकों को चरण पादुका प्रदान की गई। वितरण के दौरान जो पात्र हितग्राही किसी कारणवश योजना का लाभ लेने से छूट गए, उन्हें भी पीछे नहीं छोड़ा गया। विभागीय अमले ने ऐसे संग्राहकों के घर-घर पहुंचकर चरण पादुका प्रदान की, जिससे योजना का लाभ पात्र हितग्राहियों तक पहुंचाया जा सके।

जिले में बिलाईगढ़, धनसीर, भटगांव, मनपसार, विष्णुपाली, बरमकेला, मल्दा, सहसपानी, बटाऊपाली, तौसीर, झीकीपाली, झाल, बिरनीपाली, केदार, सालर और करनपाली समितियों के माध्यम से पात्र तेंदूपत्ता संग्राहकों को योजना से लाभान्वित किया गया है। समितिवार आयोजनों से लेकर छूटे हुए संग्राहकों के घर तक चरण पादुका पहुंचाने की इस पहल ने योजना के क्रियान्वयन को जमीनी स्तर तक पहुंचाया है। इन आंकड़ों के पीछे जंगल की पगडंडियों पर रोज मेहनत करने वाले हजारों परिवार और उनकी जरूरतें जुड़ी हुई हैं।

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चाटीपाली की महिला संग्राहकों के कदमों को मिला सुरक्षा का साथ

योजना से मिली राहत को चाटीपाली के तेंदूपत्ता संग्राहक परिवारों के अनुभवों में करीब से महसूस किया जा सकता है। यहां सुलेखा यादव, प्रेमवती, दिनेश यादव और बिमला यादव के परिवारों की महिला तेंदूपत्ता संग्राहकों को चरण पादुका योजना का लाभ मिला है। तेंदूपत्ता संग्रहण के लिए नियमित जंगल जाने वाली इन महिलाओं को रोज कंटीली झाड़ियों, पत्थरों और ऊबड़-खाबड़ रास्तों से होकर गुजरना पड़ता है।
सुलेखा यादव और प्रेमवती के परिवार की महिला संग्राहकों के लिए चरण पादुका मिलने से जंगल में तेंदूपत्ता संग्रहण के दौरान पैरों की सुरक्षा में सुविधा हुई है। पहले कठिन रास्तों पर चलते समय कांटों और पत्थरों से चोट लगने की चिंता बनी रहती थी। अब चरण पादुका के कारण उन्हीं पगडंडियों पर चलना अपेक्षाकृत अधिक सहज हुआ है।
दिनेश यादव बताते हैं कि उनके परिवार की महिला सदस्य नियमित रूप से तेंदूपत्ता संग्रहण के लिए जंगल जाती हैं। चरण पादुका मिलने से जंगल आने-जाने और संग्रहण के दौरान पैरों की सुरक्षा में मदद मिली है। परिवार के लिए यह सहायता उनके रोजमर्रा के काम में उपयोगी साबित हो रही है। बिमला यादव के परिवार की महिला तेंदूपत्ता संग्राहक को भी योजना का लाभ मिला है। जंगल में कई घंटे तेंदूपत्ता संग्रहण के दौरान पैरों को सुरक्षित रखने में चरण पादुका उपयोगी साबित हो रही है और कठिन वन-पथ पर काम करना अधिक सुविधाजनक हुआ है।
इन परिवारों के अनुभव बताते हैं कि चरण पादुका की एक जोड़ी केवल वितरण का आंकड़ा नहीं है। जंगल की कठिन पगडंडी पर रोज चलने वाली महिला संग्राहक के लिए यह सुरक्षा, सुविधा और अपने श्रम को सम्मान मिलने का अहसास भी है।

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तेंदूपत्ता से चलती है घर-गृहस्थी, सुरक्षित हो रही आजीविका की राह

वनांचल के अनेक परिवारों के लिए तेंदूपत्ता संग्रहण से मिलने वाली आय घर-गृहस्थी का महत्वपूर्ण सहारा है। इसी आमदनी से रोजमर्रा की जरूरतें पूरी करने के साथ बच्चों की पढ़ाई और परिवार के दूसरे आवश्यक खर्चों में मदद मिलती है। ऐसे में संग्रहण के दौरान मिलने वाली सुरक्षा सीधे उनकी आजीविका से जुड़ जाती है। जंगल की जिन पगडंडियों पर उन्हें रोज चलना है, उन्हीं रास्तों पर उनके कदमों को सुरक्षित और सहज बनाना योजना की व्यावहारिक उपयोगिता को सामने लाता है।
सेवा संकल्प अभियान के दौरान जिले के अलग-अलग क्षेत्रों से जनकल्याण की ऐसी अनेक तस्वीरें सामने आ रही हैं, जहां योजनाओं का असर आंकड़ों से आगे बढ़कर लोगों के रोजमर्रा के जीवन में दिखाई देता है। चरण पादुका योजना भी इसी कड़ी की एक तस्वीर है। किसी संग्राहक के लिए यह कांटों और पत्थरों से पैरों की सुरक्षा है, किसी के लिए जंगल की कठिन राह पर मिला सहारा और किसी के लिए वर्षों से किए जा रहे श्रम को मिला सम्मान।


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