आत्मनिर्भर खेती-मजदूरी से आगे बढ़कर रेशम उत्पादन से संवर रहा परिवार स्थानीय स्तर पर कोसा कृमिपालन से बढ़ी अतिरिक्त आमदनी, समृद्धि के साथ ही बच्चों की बेहतर शिक्षा का सपना भी हो रहा पूरा

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*सारंगढ़ बिलाईगढ़, 05 अक्टूबर 2026* सेवा संकल्प अभियान के बीच जिले से बदलाव की ऐसी कहानियां सामने आ रही हैं, जो बताती हैं कि, शासन की योजनाओं और विभागीय मार्गदर्शन से जुड़कर ग्रामीण परिवार किस तरह अपनी आजीविका को मजबूत बना सकते हैं। बरमकेला विकासखंड के ग्राम-सण्डा निवासी कृषक श्री ध्रुवकुमार के जीवन में रेशम उत्पादन ऐसा ही बदलाव लेकर आया है। कभी कृषि और मजदूरी पर निर्भर रहने वाले श्री ध्रुवकुमार आज टसर कृमिपालन से अतिरिक्त आय अर्जित कर अपने परिवार की आर्थिक स्थिति को बेहतर बना रहे हैं।
श्री ध्रुवकुमार पिता श्री दुडूराम का परिवार पहले मुख्य रूप से खेती से होने वाली आय पर निर्भर था। सीमित आमदनी के बीच रेशम विभाग से जुड़े और कोसा कृमिपालन की शुरुआत की। श्री ध्रुवकुमार ने विभागीय मार्गदर्शन एवं निरंतर मेहनत से कृमिपालन को धीरे-धीरे अपनी आजीविका का महत्वपूर्ण साधन बना लिया।
रेशम विभाग एवं केंद्रीय रेशम बोर्ड द्वारा समय-समय पर आयोजित जागरूकता कार्यक्रमों से उन्हें कृमिपालन की तकनीक और बेहतर उत्पादन की जानकारी मिलती रही । रेशम प्रभाग द्वारा कृमिपालन हेतु हितग्राही को रियायती दर पर स्व.डि.समूह प्रदाय किया जाता है । उक्त स्व.डि.समूह के माध्यम से श्री ध्रुवकुमार द्वारा गुणवत्ता युक्त टसर ककून का उत्पादन कर आय प्राप्ति के साथ ही केंद्र का उद्यान संधारण कार्य कर अतिरिक्त आय अर्जित की जाती है।
श्री ध्रुवकुमार की मेहनत का परिणाम उनके द्वारा अर्जित आय के आंकड़ों में भी दिखाई देता है। उनके द्वारा टसर ककून के उत्पादन एवं उद्यान संधारण कार्य से वर्ष 2024-25 में 321058/- वर्ष 2025-26 में 363270/- एवं वर्ष 2026-27 में अब तक 77,719 रुपए आय अर्जित किया जा चुका है ।
कृमिपालन से लगातार मिल रही आय से परिवार की आर्थिक स्थिति में सुधार आया है। बेहतर आमदनी से परिवार की जरूरतें पूरी करने के साथ बच्चों को अच्छी शिक्षा दिलाना भी संभव हुआ है। खेती से शुरू हुई आजीविका की उनकी यात्रा अब रेशम उत्पादन के माध्यम से आत्मनिर्भरता की ओर आगे बढ़ रही है। लम्बी समयावधि से रेशम विभाग से जुड़े श्री ध्रुवकुमार भविष्य में भी विभाग की कृमिपालन योजनाओं से जुड़े रहना चाहते हैं। वे अपने क्षेत्र के अन्य किसानों को भी टसर कोसा कृमिपालन अपनाकर आय के अतिरिक्त साधन विकसित करने के लिए प्रेरित कर रहे हैं।


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